Friday, 29 December 2017

आलेख सं : ६

शीर्षक : "परंपरा और आधुनिकता का रिश्ता"
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गृहस्थ आश्रम अर्थात् परिवार की नींव स्त्री-पुरुष के समान भागीदारी से फलीफूत होती हैं । बच्चों में शुरूआती अभिव्यक्ति की प्रवृत्ति उनकी माँ से आती हैं वनस्पति पिता के, धीरे-धीरे पिता के कुछ गुण भी आते हैं फिर समाज से । जिस तरह समाज अपनी करवट बदल रहा हैं ऐसे में बच्चों में मूल्यों के बीज बोना अतिआवश्यक क्योंकि समाज में जिस गति से आधुनिकता ने पैर पसारा है उसी गति से परंपरा और संस्कृति पीछे छूट जाने का डर सताता हैं । समय के साथ बदलना चाहिए लेकिन मूल्यवान वस्तुओं को छोड़कर, ऐसा करना हमारे पतन का कारण बनते हैं ।
परंपरा और रीति-रिवाज के अनुसार यदि पुत्र-पुत्री चले तथा काल के संग दादा-दादी, माता-पिता और समाज चलें तो सामाजिक जीवन के सभी स्तम्भ स्वयं को सुगमता से पिरोने में सहजता अनुभव कर पाएगें । लेकिन माता-पिता हो या बच्चें, जो वह कह रहें हैं वहीं बात सही जैसे प्रवृत्ति के संगी बनने में असहज होते हुए भी सहज होने का प्रयास कर रहें हैं ।

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जिसके कारण परिवारिक रिश्तों में एक-दूसरे के प्रति प्रेम, सहनशीलता एवं विश्वास में कमी अनुभव किया जा रहा हैं । इसीलिए समाज को बदलने की सोच रखने से पहले परिवार के मनः स्थिति में सौहार्द वातावरण जैसे शब्दों के मर्म को समझना जरूरी और इन दोनों से पहले हर किसी को अपने सोच को पराधुनिक बनाने की आवश्यकता समीचीन प्रतीत होती हैं ।
इसके लिए दोनों पक्षों को स्वच्छ संवाद तथा अपने-अपने माँगों में कमी करते हुए आगे बढ़ना चाहिए । हो सके तो माता-पिता या अभिभावक को एक कार्य और करना चाहिए वह हैं गुरू-शिष्य परंपरा को अपनाना । ऐसा इसलिए क्योंकि जब कोई व्यक्ति किसी को गुरू बनाता हैं तो अधिकतर शिष्य गुरु के प्रति आधी श्रद्धा और आधे संदेह में जीते हैं । बच्चे भी अपने माता-पिता के प्रति ऐसे ही भाव रखते हैं ।
माता-पिता को ऐसे प्रयास करने चाहिए जिससे बच्चों का उनके प्रति श्रद्धा गतिमान रहें । एक दिन बच्चे जब परिपक्व हो जाएगे तो स्वतः उनका आधा संदेह शत् प्रतिशत श्रद्धा में परिवर्तित हो जाएँगा । बच्चों को भी अपने माता-पिता का विश्वास जीतने के लिए सर्वप्रथम उनको आदर, श्रद्धा, स्नेह, फिक्र जैसे अमूल्य भावों का भोग लगाना चाहिए, ऐसा करने से माता-पिता के मन में आपके प्रति विश्वास भाव अवश्य जगेगा । जैसे ही विश्वास का प्रस्फुटन होगा प्रेम उनको अपने आभा से अपना बना लेगा ।
बच्चों के भविष्य पर निर्णय लेने से पहले माता-पिता और अपने स्वयं के भविष्य का निर्णय लेने से पहले बच्चों को इन पंक्तियों पर अवश्य ध्यान देना चाहिए -
1. बच्चों पर अपने निर्णय थोपने से पहले स्वयं के युवावस्था के इच्छाओं को याद करना चाहिए ।
2. पिता के निर्णय के विरुद्ध जाने से पहले स्वयं अपने बच्चों से कैसा व्यवहार भविष्य में अपेक्षित हैं ।
यदि इन दोनों बातों को सोचकर माता-पिता और बच्चे निर्णय ले, तो रिश्ते में टकराव का नहीं अपितु प्राचीन+नवीन= प्राईन सोच से समाज में  प्रगति अनुगामी होंगीऔर समाज में समरसता की गंगा बहेगी ।
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राम "मैथिल"
दरभंगा (मिथिला), बिहार
15/11/2017
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