Wednesday, 13 September 2017

लघु कथा सं- १४

शीर्षक-"बूंदे"~~~

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दो दोस्त आपस में बात करते-करते एक-दूसरे से कब उलझ गए उन दोनों को पता ही न चला । शिवम् और केशव बहुत अच्छे मित्र थे, इससे पहले शायद ही कभी उन दोनों में किसी बात को लेकर क़भी बहस भी हुई हो । खाना-खाकर जब दोनों मित्र सोने गए तो केशव अपने द्वारा किये जाने वाले परिश्रम को शिवम् के परिश्रम से श्रेष्ठ बताते हुए उसका उपहास करने लगा ।

पहले तो शिवम् ने केशव की बातों को गंभीरता से नहीं लिया लेकिन धीरे-धीरे केशव की उग्रता को देख डरने लगा । केशव इसलिए क्रोधित था क्योंकि उसे अन्य छात्रों के साथ दूर गाँवों में भिक्षा हेतु घर-घर जाना होता था जिससे वह और अन्य लोग थक जाते थे । जबकि आश्रम में शिवम् के अलावा २-३ और बच्चे गुरु जी और आश्रम की देखभाल के लिए रुकते थेजिसे केशव एक आसान कार्य समझता था ।

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प्रतिदिन, रात्रि को जब आश्रम में सभी बच्चे अपने बिस्तर पर चले जाते थे तो गुरु जी पूरे आश्रम का एक बार सघन परिभ्रमण करते थे । सामान्यतः पूरा आश्रम सन्नाटे की गॉड में सो रहा होता था मगर आज फूस-फुसाहट के स्वर उनके कानों को अपनी ओर आकृष्ट कर रही थी, स्वर के नजदीक पहुंच कर दोनों बालकों के मन की बातो को समझने की कोशिश की और बिना कोई उनके वार्ता को रोके अपने कक्ष में चले गए ।

नित क्रिया के बाद सब बालक गुरु जी संग पूजा-अर्चना करने के बाद पठन-पाठन में मग्न हो गए । पठन-पाठन के बाद जलपान किया और दोपहर बाद भिक्षाटन को निकल पड़े केशव भी सबके संग निकल पड़ा गुरु जी उसे आवाज़ देकर अपने पास बुलाया और और आज उसे आश्रम के कार्य में अपना योगदान देने को कहा ।

जब सभी बालक अपने-अपने कार्य में लग गए तो गुरु जी ने केशव को अपने पास बुलाया और उसे आधे गिलास पानी लेकर एक स्थान पर खड़े हो जाने को आदेश देने के संग सावधान करते हुए कहा पानी की बूंदो का धरती पर गिरना, कार्य में लापरवाही माना जायेगा ।

शिवम् को गुरु द्वारा दिया गया काम इतना आसान लगा कि उसकी प्रशन्नता का कोई ठिकाना न था । वह प्रसन्न मुद्रा में गुरु द्वारा बताये गए कार्य को करने में लग गया लेकिन कुछ ही घण्टों में उसके अंगों ने जवाब देना शुरू कर दिया जबकि उसे इसी मुद्रा में तब तक रहना था जब तक की अन्य बच्चे भिक्षा लेकर न आ जाए ।

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उसकी ऐसी हालत देख कर गुरु जी को उस पर दया आ गई और शिवम् को उसे कक्ष में ले जाने को कहा । जब वह जाने लगा तो गुरु जी ने उसे समझाने की मुद्रा कहा कि कोई काम न तो आसान होता हैं और न ही कठिन । लेकिन किसी एक स्थान पर रहकर किसी आसान काम को लगातार करते रहना भी उबाऊ हो सकता हैं । इसलिए जो काम भी करो चाहे वह आसान काम हो या कठिन उसमें समय-समय पर थोड़ा बहुत आमूल-चूल परिवर्तन करते रहना, वो तुम्हे निरस होने से बचायेगा और यही तुम्हे सीखते रहने की की प्रेरणा देगा ।
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#HINDI #SHORT #STORY

#मिथिला #मचान

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राम "मैथिल"
दरभंगा (मिथिला), बिहार
दिनांक- १३/०९/२०१७


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