Tuesday, 15 August 2017

आलेख सं : ५

शीर्षक : "स्वतंत्र, परतंत्र और कर्तव्य"
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हम पंछी उन्मुक्त गगन के, पिंजर बंद न गा पाएँगे,
कनक तीलियों से टकरा कर, पुलकित पंख टूट जाएँगे ।
                                               --- माखनलाल चतुर्वेदी

स्वतंत्र : बाहरी तत्व से परे स्वयं के मन की सुनना व करना,
परतंत्र : आंतरिक तत्व से परे दूसरे की सुनना व करने को बाध्य,
कर्तव्य : मध्य मार्ग (जिसमें स्वतंत्रता एवम् परतंत्रता का समन्वय हो अर्थात् जिस समय स्वयं की स्वतंत्रता को भूल हम दूसरे की स्वतंत्रता का ख्याल रखते हुए संविधान या समाजिक कटिबद्धता को अपनी तृष्णा की आहूति दे रहे होते हैं); कहा भी गया हैं अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने वाला कभी आपसे पाने का भाव नहीं रखता क्योंकि उसने देने के भाव को पाने 
की चाह से कहीं ऊपर उठा लिया होता हैं । 

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अपनी स्वतंत्रता की चिंता में जाने-अनजाने ही सही, कहीं हम दूसरे को स्वतंत्रता का हनन तो नही कर रहे होते हैं ?

भारतीय समाज की पुरातन काल से विश्व पटल पर अपनी एक अलग पहचान रही हैं चाहे वह समाजिक व्यवस्था हो या फिर राजव्यवस्था, सदैव से जनमानस की भावनाओं के प्रति आदर का भाव रखा हैं । भारतीय दर्शन समभाव अर्थात् हर जीव, हर पंथ, हर समाज, हर वर्ग और हर लिंग( स्त्री-पुरुष) आदि को समान दृष्टि भाव देना । यह सब हमे अपने सभ्यता पर गर्व करने का महान अवसर देता हैं यह सब ऐसे ही नहीं हो गया इसके लिए हमारे महान आत्माओं (पूर्वजों) ने स्वयं की स्वतंत्रता से अधिक दूसरों की स्वतंत्रता को तरजीह दी । महान देश की परंपराओं को पवित्र बनाये रखने के लिए देश के समस्त नागरिक अपने स्वतंत्रता से अधिक अपने कर्तव्य पर ध्यान देना होगा तभी देश की महान परंपरा जीवंत रह पाएँगी अन्यथा देश स्वतंत्र होकर भी परतंत्रता की बेड़ी (संप्रदायिकता, आतंकवाद, जातिवाद, अशिक्षा, मनोविकार, स्त्री-पुरुष असमानता, भ्रष्टाचार इत्यादि) में जकड़ी रहेगी ।

समाज में सुखद परिवर्तन के लिए समाज को जिम्मेदारी लेनी ही होगी । आज के समय में कितना ही क्यों न सरकारी तंत्र परिवर्तन करना चाहे लेकिन बिना समाज के पूर्ण सहयोग के किसी समस्या को दूर नहीं की जा सकती इसका उदाहरण स्त्री-पुरुष समानता की दशा से समझी जा सकती हैं (समाज स्वयं की सोच में उस गति से बदलाव नहीं ला पाया जिस गति में उसने अपनी जनसंख्या बढ़ायी हैं), जिसके लिए समान रूप से स्त्री-पुरुष दोनों जिम्मेवार हैं ।

#स्वतंत्रता_दिवस_की_समस्त_मित्रों_को_हार्दिक_बधाई

भारत को विकास के राह पर ले जाने के लिए हर भारतीय को समझना होगा कि हम भारतीयों को आधुनिक एवं पुरातन के सम्मिश्रण को आत्मसात करने की आवश्यकता समीचीन मालूम पड़ता हैं 

विकास की गति में हम संस्कृति के साथ चल सकते हैं मगर सभ्यता पीछे छोड़ना पड़ता हैं । सभ्यता माता-पिता या पूर्वज समान (जो हमारे साथ रहना चाहते हैं) और संस्कृति पुत्र- पुत्री समान (जिनके संग हम रहना चाहते हैं) । लेकिन भारतीय समाज यह निर्धारित नहीं कर पा रहा कि उसे किसके साथ रहना चाहिए क्योंकि दोनों के साथ संतुलन बनाये रखना थोड़ा कठिन हैं लेकिन असंभव नहीं । दोनों के साथ यदि समाज ने संतुलन बना लिया जाए तो भारत को विकसित राष्ट्र बनने से कोई नहीं रोक सकता ।

भारतीय समाज जिस गति से विकास की ओर अग्रसर हैं उसी गति को बनाये रखने के लिए सभी को एक रहना होगा तभी भारतीयता जीवंत रह पाएँगी ।

2-4 दशक भारतीय समाज के कठिन दौर से गुजरने वाला होने वाले हैं । यदि इस काल खंड में भारतीय समाज ने अपनी परिस्थिति स्थिर रख ली तो फिर समाज विश्व का पथ प्रदर्शक होगा अन्यथा ईश्वर मालिक ।

अंत में एक बात कहना चाहूँगा आज के ही दिन सत्तर वर्षों पहले भारत तो स्वतंत्र हो गया था मगर इन सत्तर वर्षों में भारतीयता परतंत्र हो गई - लोभ, धन, ईर्ष्या, दम्भ, यौन कुंठा, ओछी राजनीति, भ्रष्टाचार और विश्वाघात इत्यादि । 

अब समय गया हैं कि हम परतंत्रता की बेड़ी का स्वतंत्रता से आलिंगन करवाए । समाज में इस सुखद परिवर्तन के लिए समाज को अपनी जिम्मेवारी को समझनी ही होगी । #वंदे_मातरम्

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#मिथिला #बैसार

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राम "मैथिल"
दरभंगा (मिथिला) बिहार 
दिनांक- १५/०८/२०१७ 
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